संदेश

कभी दिन में ख्व्वाब देखा, कभी माहताब देखा

कभी दिन में ख्व्वाब देखा, कभी माहताब देखा। हम हो गए दीवाने, जो तेरा शबाब देखा ।। निकली थी मुँह  से आहें, पलटी थी जब निगाहें, वो मुस्कुरा के बोले, मेरा जवाब देखा ।।  यादों को तेरी जाना, मुश्किल है भलू पाना, होकर खराब देखा, पीकर शराब देखा ।। कोठे पे जब वो आई, चाँदनी भी मुस्कुराई, कहा माहताब ने भी, मैंने माहताब देखा ।। ले दे के प्यार बांटा, सौदे में निकला घाटा, लगा के जब भी हमने, दिल का हिसाब देखा ।। तारीख़ : 30 -Oct-1994

नज़र मिलाऊँ तो क़ैसे

'नज़र' मिलाऊँ तो कैसे, चश्म चढ़ा रखी है । बात कैसे करूँ मुँह में दही जमा रखी है ।। तेरे हाथो से अपने हाथ मिलाऊँ कैसे, मैंने हाथों में मेहँदी जो लगा रखी है ।। तुझसे मिलने को कई बार हुई है हसरत, आऊं कैसे, पैरों में पायल जो चढ़ा रखी है ।। सोचा मिलने को आऊं छत पे, मगर तेरे अब्बा वहाँ खाट लगा रक्खी है ।। आज होगी निगाहों से गुफ्तगू अपनी, थोड़ी तुमने, थोड़ी मैंने भी चढ़ा रखी है ।। (5-सितम्बर-2019)

मुहब्बत क्या है, सिखाऊंगा तुम्हे

मुहब्बत क्या है, सिखाऊँगा तुम्हे । कभी मिलने तो आओ, दिखाऊँगा तुम्हे ।। कभी भूले भी, न छेड़ना मुझको, अपनी बारी में, रुलाऊंगा तुम्हे ।। बहुत दिन छोड़ के न जाना हमको, फिर मिले, तो काट खाऊंगा तुम्हे ।। आज कर लो सितम जो करना है, किसी दिन उँगलियों पे नचाऊँगा तुम्हें ।। लिख के रखी है हर बात जो तुमसे करनी है, कभी फुर्सत से बैठो तो बताऊंगा तुम्हे ।। अपनी खिड़की की चटखनो को रखना खोले, कोई रात मिलने आऊँगा तुम्हें ।। हर रोज़ तुम्हे देखना पेड़ो की ओट से, एक-तरफ़ा मुलाक़ात बताऊंगा तुम्हे ।। तमाम दर्द ‘नज़र’ दिल में लिए बैठा हूँ, ना तुम पूछोगे, ना मैं बताऊँगा तुम्हें ।। (16-फ़रवरी-2020)

ये जो ज़ुल्फ़ काले काले है

ये जो ज़ुल्फ़ काले काले है | जाने कितनो को मार डाले है || उनकी आँखों से ज़रा दूर ही रहियो, ज़ालिम ने क़ातिलों को पाले है || कभी आबाद था ये दिल का मकाँ, अब फ़क़त मकड़ियों के जाले है || उसके लिए हर एक दिन है होली, जिसे देखे है, इश्क़ में रंग डाले है || तारीख़ :  15-Apr-1994

कहने को तूफ़ां से भी टकरा गए

कहने को तूफ़ां से भी टकरा गए | लेकिन निगाह-ए-यार से घबरा गए || ग़मों की तिजोरी भरी थी अभी, अश्कों के मोती लो फिर आ गए || अभी तुमको देखा निगाहें मिली, इतने में ही तुम तो शर्मा गए || तारीख़ : 5 -Jan-1998

ज़िंदगानी ही तो है

ज़िंदगानी ही तो है | बितानी ही तो है || मुहब्बत का क्या, कहानी ही तो है || ढल जाएगी यूँ ही, जवानी ही तो है || मेरा टूटा हुआ दिल, निशानी ही तो है || अश्क़ क्यूँकर बहाऊँ, पानी ही तो है || मौत से क्या डरना, आनी ही तो है || 'नज़र' देखती है उन्हें, दीवानी ही तो है || तारीख़ :  19-Feb-2014

तुम साथ चलोगे जो मेरे साथ दो क़दम

तुम साथ चलोगे जो मेरे साथ दो क़दम | तो वादा रहा कि साथ ना छोड़ेंगे तेरा हम || इक रोज़ मुलाक़ात हुई उनसे राह पर, अब रोज़ गुज़रते है उन्ही रास्तों से हम || शब्-ए-फ़िराक में इतना उकता गया है जी, क्या करें गर वस्ल की ख्वाइश न करें हम || मिटता है दर्द-ए-दिल दवा-ए-विसाल सें, सीनें में रगड़ने से क्या फायदा मरहम || मेरी क़िस्मत में उनके हाथों लिखीं हैं ज़फाएँ, नाराज़ हो तो ज़्यादा, मेहरबान हो तो कम || अब याद करके तुझको न रोएंगे बार बार, अब पहरों इत्मिनान से सोया करेंगे हम || 'नज़र' का हाल इन दिनों बुझा बुझा सा है, और नींद भी कुछ आजकल आने लगी है कम || तारीख़ : 14-Oct-1994