तुम साथ चलोगे जो मेरे साथ दो क़दम

तुम साथ चलोगे जो मेरे साथ दो क़दम |
तो वादा रहा कि साथ ना छोड़ेंगे तेरा हम ||

इक रोज़ मुलाक़ात हुई उनसे राह पर,
अब रोज़ गुज़रते है उन्ही रास्तों से हम ||

शब्-ए-फ़िराक में इतना उकता गया है जी,
क्या करें गर वस्ल की ख्वाइश न करें हम ||

मिटता है दर्द-ए-दिल दवा-ए-विसाल सें,
सीनें में रगड़ने से क्या फायदा मरहम ||

मेरी क़िस्मत में उनके हाथों लिखीं हैं ज़फाएँ,
नाराज़ हो तो ज़्यादा, मेहरबान हो तो कम ||

अब याद करके तुझको न रोएंगे बार बार,
अब पहरों इत्मिनान से सोया करेंगे हम ||

'नज़र' का हाल इन दिनों बुझा बुझा सा है,
और नींद भी कुछ आजकल आने लगी है कम ||


तारीख़ : 14-Oct-1994

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