नज़र मिलाऊँ तो क़ैसे

'नज़र' मिलाऊँ तो कैसे, चश्म चढ़ा रखी है ।
बात कैसे करूँ मुँह में दही जमा रखी है ।।

तेरे हाथो से अपने हाथ मिलाऊँ कैसे,
मैंने हाथों में मेहँदी जो लगा रखी है ।।

तुझसे मिलने को कई बार हुई है हसरत,
आऊं कैसे, पैरों में पायल जो चढ़ा रखी है ।।

सोचा मिलने को आऊं छत पे, मगर
तेरे अब्बा वहाँ खाट लगा रक्खी है ।।

आज होगी निगाहों से गुफ्तगू अपनी,
थोड़ी तुमने, थोड़ी मैंने भी चढ़ा रखी है ।।


(5-सितम्बर-2019)





टिप्पणियाँ