कागज़ी फ़ूल

कभी कुछ लम्हे जो पन्नो में उतारे थे,
लगा वक़्त की साख में धूल हो गए वो सब |
मुदत्तों बाद जब उन्हें खोल के देखा,
कागज़ी फूल हो गए वो सब ||
  - 'नज़र'

कभी कुछ बातें, कुछ यादें दिल में ऐसे घर कर लेती हैं की फिर वो कभी नहीं जाती | ऐसी ही कुछ पुरानी बातें, कुछ पुराने नज़्म, कुछ पुरानी ग़ज़लें और कुछ पुराने अशआर पुराने पन्नों में मिले | सोचा क्यूँ ना उनको सबको पेश करूँ |  इसके पहले वो धूल हो जाएं , क्यों न उन कागज़ी फूलो की खुशबू एक बार फिर ली जाये | एक बार फिर उन हालातों और उन जज़्बातों को याद किया जाये | क्यों न एक बार फिर ....

उम्मीद है की इनमें से कुछ आपको पसंद आएगी और शायद कुछ काम भी आ जाएं। ;)

ख़ाकसार का तख़ल्लुस 'नज़र' है - कहीं ग़ज़लों और नज़्मों के बीच मिल जाये तो नाचीज़ को पहचान लीजियेगा ||   

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